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क्षारसूत्र चिकित्‍सा

क्षारसूत्र चिकित्सा

 

'सुश्रृत संहिता' आयुर्वेद विज्ञान की प्राचीन शल्य चिकित्सा विधि का अधिकृत ग्रन्थ है। महर्षि सुश्रृत आयुर्वेद मे शल्य चिकित्सा के जनक माने जाते है। 

उक्त चिकित्सा प्रक्रिया से अर्श-भगन्दर (piles and fistula) की चाकू रहित शल्य चिकित्सा की जाती है। इस विधि में औषधीय तत्वों से भावित सूत्र के बांधने एवं पिरोने से अर्श कटकर गिर जाते है एवं भगन्दर के धाव बिना अतिरिक्त मर्हम पट्टी के स्वतः भर जाते है तथा दुबारा उसी स्थान पर पुनः उत्पन्न नही होते । इन रोगों मे यह विधि 99 प्रतिशत सफल शल्य चिकित्सा है। यह काफी सस्ती, प्रचलित एवं सफल पद्धति है। 

यद्धपि उक्त विधि, शास्त्रों में सूत्र रूप से वर्णित थी, जिसे विकसित कर व्यावहारिक स्वरूप में स्थापित करने का श्रेय बनारस हिन्दू विश्‍वविद्यालय को है। वहॉ के स्नातक उक्त पद्धति को वर्तमान रूप में प्रसारित कर रहे है । राजस्थान में आयुर्वेद विभाग के अनेक राजकीय चिकित्सक इस प्रक्रिया से अर्श-भगन्दर का सफल इलाज कर रहे है। मदन मोहन मालवीय राजस्थान आयुर्वेद महाविद्यालय, उदयपुर ने राजस्थान में क्षारसूत्र चिकित्सा प्रारम्भ की थी। राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान जयपुर की स्थापना के बाद वंहा भी चिकित्सा शुरू हो चुकी है। 

आयुर्वेद विभाग के अधीन राजकीय आयुर्वेदिक 'अ' श्रेणी चिकित्सालय, लौगिया-अजमेर में इसका स्पेशलिटी क्लीनिक संचालित है। इसके अतिरिक्त वर्तमान में राजकीय आयुर्वेद 'अ' श्रेणी चिकित्सालय ब्यावर, कोटा एवं भीलवाडा में भी इसके विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध है। 

आयुर्वेद विभाग द्वारा अर्शभगन्‍दर की सफल चिकित्‍सा हेतु 20 जिलों में प्रति वर्ष 20 आयुर्वेद चिकित्‍सा शिविर 10 दिवसीय विशिष्‍ठ संगठन योजनान्‍तर्गत अनुसूचित जाति बाहुल्‍य क्षेत्रों में विशेषज्ञों के द्वारा जनहित में नि:शुल्‍क चिकित्‍सा शिविर आयोजित किये जाते है। 

धार्मिक/सेवा संस्‍थाओं के तत्‍वाधान में रोग विशेष/अवधि मांग के अनुसार स्‍थान विशेष पर शिविर आयोजित करने के प्रस्‍ताव प्राप्‍त होने पर उन्‍हें चिकित्‍सा विशेषज्ञों की सुविधा प्रदान की जाती है शेष समस्‍त व्‍यवस्‍था संस्‍था द्वारा वहन की जाती है।