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आयुर्वेद (आयुः+वेद) इन दो शब्दों के मिलने से बने आयुर्वेद शब्द का अर्थ है ''जीवन विज्ञान''। आयुर्वेद का प्रलेखन वेदों में वर्णित है। आयुर्वेद अथवा भारतीय जीवन विज्ञान के उद्गम से संबद्ध है और उसका विकास विभिन्न वैदिक मंत्रों से हुआ है, जिनमें संसार तथा जीवन, रोगों तथा औषधियों के मूल तत्व/दर्श्‍ान का वर्णन किया गया है। आयुर्वेद के ज्ञान को चरक संहिता तथा सुश्रुत संहिता में व्यापक रूप से प्रलेखित किया गया था। आयुर्वेद के अनुसार जीवन के उद्देश्‍यों-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए स्वास्थ्य पूर्वापेक्षित है। आयुर्वेद मानव के शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक और सामाजिक पहलुओं का पूर्ण समाकलन करता है, जो एक दूसरे को प्रभावित करते है। 

भारतीय चिकित्सा पद्धति के अंतर्गत वे पद्धतियां आती है, जो भारत में उदभूत हुई, या भारत के बाहर उदभूत हुई परंतु कालांतर में भारत में अपना ली गई और अपने अनुकूल कर ली गई है। ये पद्धतियां है आयुर्वेद, सिद्ध, योग और प्राकृतिक चिकित्सा । आयुर्वेद आदि पद्धतियां जनसंख्या के एक बडे भाग को, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रो में स्वास्थ्य सेवा सुविधाएं उपलब्ध करा रही है। देश के अधिकांश राज्यों में भारतीय चिकित्सा पद्धति लोकप्रिय है। न केवल भारत वरन्‌ विश्‍व के अन्य भागों के लोग भी आधुनिक दवाइयों की तुलना में पार्श्‍व प्रभावों से रहित होने के कारण इन पद्धतियों के जरिए उपचार कराने में इच्छुक होते जा रहे है।

आयुर्वेद विभाग, राजस्‍थान

योग चिकित्सा सेवाएं

योग के वास्तविक प्राचीन स्वरूप की उत्पत्ति औपनिषदिक परम्परा का अंग है। योग मुख्यतः एक जीवन पद्धति है, जिसे पतंजलि ने क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत किया था। इसमें यम, नियम, आसन,प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि आठ अंग है। योग के इन अंगों के अभ्यास से सामाजिक तथा व्यक्तिगत आचरण में सुधार आता है, शरीर में ऑक्सीजन युक्त रक्त के भली-भॉति संचार होने से शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है, इंद्रियां संयमित होती है तथा मन को शांति एवं पवित्रता मिलती है। योग के अभ्यास से मनोदैहिक विकारों/व्याधियों की रोकथाम, शरीर में प्रतिरोधक शक्ति की बढोतरी तथा तनावपूर्ण परिस्थितियों में सहनशक्ति की क्षमता आती है। ध्यान का, जो आठ अंगो में से एक है, यदि नियमित अभ्यास किया जाए तो शारीरिक अहितकर प्रतिक्रियाओं को घटाने की क्षमता बढती है, जिससे मन को सीधे ही अधिक फलदायक कार्यो में संलग्न किया जा सकता है।

प्राकृतिक चिकित्सा सेवाएं

प्राकृतिक चिकित्सा न केवल उपचार की पद्धति है, अपितु यह एक जीवन पद्धति है । इसे बहुधा औषधि विहीन उपचार पद्धति कहा जाता है।

पंचकर्म

पंचकर्म आयुर्वेद का एक प्रमुख शुद्धिकरण एवं मद्यहरण उपचार है। पंचकर्म का अर्थ पाँच विभिन्न चिकित्साओं का संमिश्रण है। इस प्रक्रिया का प्रयोग शरीर को बीमारियों एवं कुपोषण द्वारा छोड़े गये विषैले पदार्थों से निर्मल करने के लिये होता है। आयुर्वेद कहता है कि असंतुलित दोष अपशिष्ट पदार्थ उतपन्न करता है जिसे ’अम’ कहा जाता है। यह दुर्गंधयुक्त, चिपचिपा, हानिकारक पदार्थ होता है जिसे शरीर से यथासंभव संपूर्ण रूप से निकालना आवश्यक है। ’अम’ के निर्माण को रोकने के लिये आयुर्वेदिक साहित्य व्यक्ति को उचित आहार देने के साथ उपयुक्त जीवन शैली, आदतें तथा व्यायाम पर रखने, तथा पंचकर्म जैसे एक उचित निर्मलीकरण कार्यक्रम को लागू करने की सलाह देते हैं।

पंचकर्म एक प्रक्रिया है; यह ’शोदन’ नामक शुद्धिकरण प्रक्रियाओं से संबंधित चिकित्साओं के समूह का एक भाग है। पंचकर्म के पाँच चिकित्सा ’वमन’ ’विरेचन, ’नास्य’, ’बस्ती’ एवं ’रक्त मोक्षण” हैं। दोषों को संतुलित करने के समय पाँच चिकित्साओं की यह शॄंखला शरीर के अंदर जीवविष पैदा करने वाले गहरे रूप से आधारित तनाव एवं रोग को दूर करने में मदद करता है।

यह हमारे दोषों में संतुलन वापस लाता है एवं स्वेद ग्रंथियों, मूत्र मार्ग, आँतों आदि अपशिष्ट पदार्थों को उत्सर्जित करने वाले मार्गों के माध्यम से शरीर से ’अम’ को साफ करता है। पंचकर्म, इस प्रकार, एक संतुलित कार्य प्रणाली हैI इसमें प्रतिदिन मालिश शामिल है और यह एक अत्यंत सुखद अनुभव है। हमारे मन एवं शरीर व्यवस्था को दुरूस्त करने के लिये आयुर्वेद पंचकर्म  को एक मौसमी उपचार के रूप में सलाह देता है।

मुखपृष्‍ठ

श्री कालीचरण सराफ (मंत्री)

चिकित्‍सा एवं स्‍वास्‍थ्‍य विभाग,

चिकित्‍सा एवं स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं (ESI)

चिकित्‍सा शिक्षा विभाग,

आयुर्वेद एवं भारतीय चिकित्‍सा पद्धति  

मुखपृष्‍ठ

श्री बंशीधर (राज्‍यमंत्री)

चिकित्‍सा एवं स्‍वास्‍थ्‍य विभाग,

चिकित्‍सा एवं स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं (ESI)

चिकित्‍सा शिक्षा विभाग,

आयुर्वेद एवं भारतीय चिकित्‍सा पद्धति  

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